Monday, October 03, 2011

बाल साहित्य संसार की एक और किरण : नया सवेरा

-डा० जगदीश व्योम

त्रिलोक सिंह ठकुरेला हिन्दी बालसाहित्य के कुशल रचनाकार हैं, नवगीत पर उनकी बहुत अच्छी पकड़ है। "नया सवेरा" ठकुरेला जी की बाल कविताओं का संग्रह है जो राजस्थानी ग्रंथागार जोधपुर से प्रकाशित हुआ है। इस संग्रह में कुल अट्ठाईस बाल कविताएँ हैं जो पूरी तरह से बाल मनोविज्ञान के अनुरूप हैं साथ ही इन कविताओं में दैनिक जीवन में काम आने वाली अत्यन्त शिक्षाप्रद बातों को बातों बातों में बच्चों तक पहुँचाने का सफल प्रयास ठकुरेला जी ने किया है।
बच्चों के लिए प्रतिदिन खेलना बहुत जरूरी है विशेषकर आज के कम्यूटर और टेलिविजन के घोर युग में खेलना और भी महत्त्वपूर्ण हो गया है-

खेलो खेल शाम को प्रतिदिन
तन और मन होंगे बलवान
ठीक समय से खाना खाओ
फिर से पढ़ो बढ़ाओ ज्ञान । (पृ०- 20)


"नया सवेरा लाना तुम" कविता में सूर्य के माध्यम से कवि ने बच्चों को आलसी न होने की शिक्षा यूँ ही बातों बातों में दी है-
जो चलते हैं सदा निरंतर
बाजी जीत वही पाते
और आलसी रहते पीछे
मन मसोस कर पछताते। (पृ०- 21)


"मीठी बातें" कविता के द्वारा कवि ने मीठी बोली का महत्व बताया है-
मीठी मीठी बातें कहकर
सब कितना सुख पाते
मीठी मीठी बातें सुनकर
सब अपने हो जाते । (पृ०- 22)

समूचे ब्रह्माण्ड में पृथ्वी के अतिरिक्त और भी ऐसे ग्रह होंगे जहाँ जीवन हो सकता है, ये जिज्ञासा हमेशा रही है, बच्चे के माध्यम से इसे खेल खेल में कहलवाकर ठकुरेला जी ने अपने कवि की गहन और विस्तृत सोच का परिचय दिया है-
कोई ग्रह तो होगा ऐसा
जिस पर होगी बस्ती
माँ ! बच्चों के साथ वहाँ
मैं खूब करूँगा मस्ती । (पृ०- 24)

तितली को देखकर तर तरह के प्रश्न बच्चों के मन में उठते रहते हैं, ऐेसे प्रश्न कविता में उठाकर कवि बच्चों में अतिरिक्त जिज्ञासा जाग्रत करना चाहता है-
जाने किस मस्ती में डूबी
फिरती है इठलाती
आखिर किसे खोजती रहती
हरदम दौड़ लगाती (पृ०- 25)

रेल के माध्यम से कवि ने निरंतर चलते रहने की प्रेरणा बच्चों को दी है-
रेल सभी से कहती जैसे
रुको न, दौड़ लगाओ
कठिन नहीं है कोई मंजिल
मेहनत से सब पाओ । (पृ०- 26)

पेड़ मानव के लिये कितने उपयोगी हैं, इस बात को कितनी सहजता से इस कविता में कह दिया गया है-
पर्यावरण संतुलित रखते
मेघ बुलाकर लाते
छाया देकर तेज धूप से
सबको पेड़ बचाते । (पृ०- 28)

पानी का दूसरा नाम ही जीवन है, बच्चों को ये बताना बहुत आवश्यक है, कवि ने इसे भी बहुत सहजता से कविता में प्रस्तुत किया है-
पानी से ही फसलें उगतीं
हर वन उपवन फलता
पानी से ही इस वसुधा पर
सबका जीवन चलता । (पृ०- 39)

मेघों की चर्चा कवि ने एकदम निराले अंदाज में की है-
कभी खेत में, कभी बाग में
कभी गाँव में जाते
कहीं निकलते सहमे सहमे
कहीं दहाड़ लगाते । (पृ०- 43)

नया सवेरा की कविताएँ बच्चों के अनुरूप तो हैं ही इनकी यह भी विशेषता है कि ये कविताएँ पूरी तरह से लय और तुक में हैं, बच्चों की कविताओं में लय का ध्यान विशेष रूप से रखना ही होता है, ठकुरेला जी की सभी बाल कविताएँ इस विचार से बहुत परिपक्व बाल कविताएँ हैं। बच्चे इन कविताओं को पसंद करेंगे और अपने विद्यालयों में होने वाले समारोहों में इन्हें याद कर करके प्रस्तुत करेंगे, यही इन कविताओं की सफलता है और कवि ठकुरेला से यह अपेक्षा है कि भविष्य में वे और भी सुन्दर बाल मनोविज्ञान के अनुरूप कविताएँ और बालगीत हिन्दी साहित्य संसार को देंगे। संग्रह का मुद्रण त्रुटिहीन है, आवरण भी आकर्षक है । यह संग्रह बाल साहित्य संसार की एक नई किरण बनकर उभरेगा, ऐसा मेरा विश्वास है।

नया सवेरा
प्रकाशक - राजस्थानी ग्रंथागार, सोजती गेट, जोधपुर (राज०)
प्रथम संस्करण- 2011
कवि- त्रिलोक सिंह ठकुरेला
मूल्य- 50=00
ISBN 978-81-96103-20-3

समीक्षा-

डा० जगदीश व्योम

Tuesday, June 21, 2011

आधी ज़िन्दगी पूरा सच

कविता मनुष्य को मनुष्य बने रहने देने में अहं भूमिका निभाती है, यही कारण है कि घोर कलयुग (मशीन युग) में भी कविता उसी गति से लिखी और पढ़ी जा रही है जिस गति से पहले लिखी जाती थी। एक प्रश्न और जो प्रायः साहित्यिक पुस्तकों को लेकर उठाया जाता है कि क्या इण्टरनेट का बढ़ता स्वरूप मुद्रित पुस्तकों के संसार को काल कवलित कर देगा ? इस विषयक यह स्पष्ट जान लेना चाहिये कि मुद्रित पुस्तकों का महत्त्व कभी कम नहीं होगा। मुद्रित पुस्तके अपनी जगह हैं और वेब पुस्तकें और जालघर अपनी जगह। पुस्तकों का निरन्तर प्रकाशित होना इसी बात का परिचायक है। कविवर हरिराम पथिक का " आधी ज़िन्दगी पूरा सच "  मुक्तक संग्रह अपने भव्य कलेवर के साथ प्रकाशित हुआ है। इस संग्रह के मुक्तक कवि की समय समय की अनुभूतियों के शब्द-चित्र हैं जिन्हें सरल और सहज भाषा में कवि ने प्रस्तुत किया है। अपनी मिट्टी से जुड़े रहकर इंसान बने रहना एक कवि का सर्वोपरि धर्म है यही आकांक्षा कवि के इस मुक्तक में झलक रही है-
जी करता है दान करूँ नित, हो जाऊँ धनवान बड़ा
सबको बाहों का संबल दे, बन जाऊँ बलवान बड़ा
चाह नहीं है नाम कमाऊँ, आसमान पर चमकूँ मैं-
अपनी मिट्टी से जुड़ जाऊँ, हो जाऊँ इंसान बड़ा ।

गाँव और शहर के बीच  बहुत गहरा रिश्ता है। गाँव अधुनातन बनने की चाह में शहर की ओर पलायन करता है तो शहर भी लोक संस्कृति, लोक परम्परा और लोक शब्दावली रूपी संजीवनी के लिए गाँवों पर ही निर्भर रहता है, इस तथ्य को गाँव और शहर दोनों को समझना ही होगा। जो लोग निजी स्वार्थ सिद्धि हेतु गाँव व शहर के मध्य अलगाव और नफ़रत के बीज बोते हैं, उन्हें कवि ने इस मुक्तक के माध्यम से बहुत बड़ा संकेत किया है-

हर शहर का गाँव से मजबूत नाता है
गाँव का हर रास्ता भी शहर जाता है
गाँव के दिल में न घोलो ज़हर नफ़रत का-
गाँव ही तो हर शहर का जन्मदाता है ।

पथिक जी के इस मुक्तक संग्रह के मुक्तक जन सामान्य के दैनिक जीवन में काम आने वाले सूक्त वाक्य हैं जिनके द्वारा अपनी भाषा को धारदार बनाने में तथा अपने भावों को सम्प्रेषित करने में विशेष मदद मिलेगी। कहा जाता है कि यदि किसी कविता के किसी अंश का प्रयोग जन सामान्य करने लगे तो समझना चाहिये कि कवि ने सफल कविता का सृजन किया है। पथिक जी का मुक्तक संग्रह इस कसौटी पर खरा उतरेगा ऐसा मेरा सहज विश्वास है।

डा० जगदीश व्योम 

Friday, June 03, 2011

नन्हा बलिदानी

नन्हा बलिदानी 
                                   -बाल उपन्यास




यह पुस्तक बच्चों के लिए विशेष रूप से लिखी गई हैं। भाषा बच्चों के अनरूप है। देश प्रेम, मित्रता, साहस की प्रेरणा देने वाली यह पुस्तक बच्चों के लिए अत्यन्त उपयोगी है। मानव संसाधन मंत्रालय भारत सरकार का केन्द्रीय विद्यालय संगठन इस पुस्तक को अपने केन्द्रीय विद्यालयों के पुस्तकालयों हेतु विशेष रूप से स्वीकृत कर चुका है। देशभर के बाल साहित्यकारों ने इस पुस्तक की भूरि-भूरि प्रशंसा की है तथा इसे बच्चों के पाठ्यक्रम में लगाये जाने के लिए बहुत उपयोगी बताया है।
० इस पुस्तक का कई भाषाओं में अनुवाद हुआ है तथा कई विद्यालय इसे नियमित रूप से वच्चों को पढ़वा रहे हैं।
० पुस्तक में 40 पृष्ठ है तथा मूल्य मात्र 135  रुपए है।

नन्हा बलिदानी
लेखक- डा० जगदीश व्योम
मूल्य- 135 रुपए
प्रकाशक- निशात प्रकाशन, दिल्ली

Monday, November 23, 2009

नर्मदा की लहरों-सी अठखेलियाँ करती अभिज्ञा की कविताएँ



चिट्ठाजगत




नर्मदांचल के वरिष्ठ कवि हरगोविन्द शर्मा के काव्य-संग्रह "अभिज्ञा" में १०१ कविताएँ हैं। इन कविताओं में कवि ने अपने लम्बे जीवनानुभवों को विविध बिम्बों और प्रतीकों के माध्यम से प्रस्तुत किया है। कवि की चिंता कहीं सांस्क॓तिक अवमूल्यन को लेकर उभरी है तो कहीं लोक जीवन की विसंगतियाँ उसे उद्वेलित करती हैं। कुल मिलाकर कवि एक अच्छे समाज और सकारात्मक सोच का पक्षधर है। प्रकृति चित्रण में कवि का मन खूब रमा है। शृंगारपरक कविताओं के सृजन में कवि सिद्धहस्त है। छन्द, लय और प्रवाह ऐसा कि कविता नर्मदा की लहरों-सी अठखेलियाँ करती हुई एक विशिष्ट भाव-भंगिमा के साथ प्रवाहित होती हुई सी प्रतीत होती है। कवि ने अनेक प्रकार के छन्दों के सफल प्रयोग "अभिज्ञा" की कविताओं में किए हैं। कविताओं की प्रवाहात्मकता देखते ही बनती है-
पांखुरी खिली नहीं
रूप घट भरा नहीं
मकरन्दी मलयज की
वासन्ती गन्ध नहीं।

तंद्रिलता नयन बीच
अर्चन - उपासना
दिवा सपन आँखों में
जीवन की साधना।

इसी प्रकार "वतन" कविता में कवि ने सधे हुए छंद में लय एवं प्रवाह के साथ-साथ शब्द-मैत्री पर विशेष ध्यान दिया है-

नयन याचक दरश सुख सपन के लिये
रूप आसक्ति मानस तपन के लिये
चिर मनःस्ताप केवल पतन के लिये
श्वास प्रश्वास है जग मनन के लिये।।
संग्रह की "पछुआई पवन" कविता पढ़ते ही एक भावचित्र सहज ही उभरने लगता है-

पवन चले पछुआई पूरब के पौर पौर
महलों से कुटिया तक काँप रहा छोर-छोर।।
निर्वसना अंगों की झाईं है गुलाब सी
रुपहले अधरों की गंध है पराग सी
जन मन को मोह रही नाच रही ठौर ठौर
पवन चले पछुआई पूरब के पौर पौर ।।

कुल मिलाकर अभिज्ञा की कविताएँ कवि के जीवनानुभवों की रचनात्मक अभिसंचित पूँजी है जिनमें सदियों से अविछिन्न चली आ रही पारंपरिक काव्यशैली की अनूठी गंध है। इन कविताओं को पढ़कर एक विशेष प्रकार की अनुभूति होती है। मध्य-प्रदेश लेखक संघ प्रकाशन द्वारा प्रकाशित यह काव्य-संग्रह पठनीय एवं प्रशंसनीय है।

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अभिज्ञा (काव्य-संग्रह)
कवि- हरगोबिन्द शर्मा
प्रकाशक- मध्यप्रदेश लेखक संघ, भोपाल
संस्करण- जून-२००८

Wednesday, February 20, 2008

यदि कोई पूछे -( If Someone asks...)

हाइकु कविता अब भारतवर्ष में काफी चर्चित है। हिन्दी में हाइकु लिखने वालों की संख्या निरंतर बढ़ रही है। यह इस बात का प्रमाण है कि हाइकु कविता के प्रति भारतीय साहित्यकारों में आकर्षण बढ़ा है। भारत में हाइकु का प्रचार प्रसार करने वालों में शीर्षस्थ नाम प्रो. सत्यभूषण वर्मा का है। प्रो. वर्मा से प्रेरित होकर कमलेश भट्ट कमल ने ’हाइकु-1989’ तथा ’हाइकु -1999’ शीर्षक से दो महत्त्वपूर्ण हाइकु संकलन संपादित किए और उन्हें प्रकाशित कराया। (यह क्रमश: 1989 तथा 1999 में प्रकाशित हुए।) ’हाइकु 1989’ में 30 हाइकुकार तथा ’हाइकु 1999’ में 40 हाइकुकारों के चुने हुए हाइकु सम्मिलित किए गए। (उस समय तक के प्रतिनिधि हाइकुकार) हाइकुकारों की यह संख्या निरंतर बढ़ रही है। प्रो. वर्मा की प्रेरणा से ही डॉ. जगदीश व्योम ने ’हाइकु दर्पण’ पत्रिका का प्रकाशन प्रारम्भ किया, यह पत्रिका हिन्दी हाइकु कविता को समर्पित हाइकु की एकमात्र सम्पूर्ण पत्रिका है। इस पत्रिका से हाइकुकारों को हाइकु प्रकाशन का गरिमामय मंच मिला और हाइकु को लोगों ने गम्भीरता से लिया।

भारतवर्ष में हिन्दी हाइकुकारों में से अनेक हाइकुकार ऐसे हैं जो हाइकु के मूल उत्स को जानना चाहते हैं, हाइकु के जनक जापान देश से परिचित होना चाहते हैं और जापान के प्रसिद्ध हाइकुकारों के विषय में अधिक से अधिक जानने की इच्छा रखते हैं। परन्तु भाषा उनके मध्य में दीवार बनकर खड़ी हुई है। जापानी भाषा का ज्ञान न होने के कारण जापानी हाइकुकारों के विषय में जानकारी नहीं हो पाती है और उनकी हाइकु कविताओं से भी पूरी तरह से लोग अनजान ही बने हुए हैं। बासो, इस्सा, मासाओका शीकी एवं अन्य हाइकुकारों के विषय में जानने की जिज्ञासा इधर जैसे-जैसे हाइकु कविता लोकप्रिय हुई है; और बढ़ी है। डॉ. अंजली देवधर ने मासाओका शीकी की जीवनी, उनके संस्मरण, उनके दुर्लभ चित्र तथा उनके चुने हुए हाइकुओं का अंग्रेजी के साथ-साथ हिन्दी अनुवाद करके तथा उसे "यदि कोई पूछे तो....." शीर्षक से पुस्तकाकार रूप में प्रकाशित करवाकर एक अमूल्य भेंट हिन्दी हाइकुकारों को दी है। ’मात्सुयामा म्यूनिसिपल शीकी किनन म्यूजियम’ के बारे में भी भारत में रहने वाले हाइकुकारों को महत्त्वपूर्ण जानकारी मिली है। म्यूजियम ने यह कार्य डॉ. अंजली देवधर को करने की अनुमति देकर अप्रत्यक्ष रूप से हाइकुकारों, हाइकु पाठकों तथा हाइकु के जिज्ञासुओं व शोधाiर्थयों पर बड़ा उपकार किया है।
’मासाओका शीकी’ के हाइकु उनकी जीवनचर्या के कतिपय क्षणों की मौलिक प्रस्तुति है जो उन्हें अनुभव हुआ उसे ज्यों का त्यों लिख दिया। डॉ. अंजली देवधर ने जापानी के हाइकुओं को अंग्रेजी के माध्यम से हिन्दी में अनूदित करके अति महत्त्वपूर्ण कार्य किया है। शीकी की हाइकु कविताओं का मूल भाव बना रहे, इसका पूरा ध्यान रखा गया है। द्विभाषी अनुवाद काफी कठिन कार्य है परन्तु त्रिभाषी (जापानी- अंग्रेजी- हिन्दी) तो सर्वर्था कठिनतम कार्य है। परन्तु डॉ. अंजली जी ने मानों अपनी पूरी शक्ति, पूरी मेधा एवं अपनी हाइकु यात्राओं के समग्र अनुभवों की महनीय पूँजी लगाकर इस कार्य को पूरा किया है।
पुस्तक में मासाओका शीकी का जीवन वृत्त वर्षवार व बिन्दुवार दिया गया है जिसे अंग्रेज़ी व हिन्दी दोनों भाषाओं में दिया गया है। इसे पढ़ने के बाद पाठक को ऐसा अहसास होगा कि वह शीकी को अपने मध्य देख रहा है। शीकी कहीं उसके बीच आकर अमूर्त्त रूप में अवiस्थत हो गए हैं। वास्तव में यह प्रस्तुति की सफलता का परिचायक है।
हाइकु के अनुवाद के साथ-साथ हाइकु विशेष की रचना का समय, हाइकुकार शीकी की अवस्था (हाइकु की रचना के समय), हाइकु रचना के समय हाइकुकार की मनःस्थिति और तत्कालीन परिस्थितियाँ इन सब की जानकारी प्रत्येक हाइकु के साथ दी गई है। इससे हाइकु अत्यन्त सम्प्रेषणीय हो गए हैं और प्रत्येक हाइकु के साथ पाठक शीकी की मनोदशा के साथ उसी भावभूमि पर शीकी से स्वयं को जुड़ा हुआ पाता है। यह सब यदि किसी अनूदित पुस्तक को पढ़कर संभव है तो अनुवाद की सफलता का इससे बड़ा और कोई प्रमाण भला क्या होगा?
डॉ. अंजली देवधर अंग्रेज़ी भाषा की विदुषी हैं परन्तु हिन्दी भाषा उनके रोम-रोम में समाहित है। यही कारण है कि अनुवाद करते समय वे अत्यन्त सावधानी बर्तती हैं, प्रत्येक शब्द पर अनेक कोणों से विचार करती हैं, शब्द के सटीक प्रयोग और उसकी अर्थ व्यंजना का पूरा पूरा घ्यान रखते हुए उसका प्रयोग करती हैं। अनुवाद में उन्होंने विशुद्ध हिन्दी शब्दों के प्रति अतिरिक्त व्यामोह से स्वयं को बचाया है तथा संप्रेषणीयता पर पूरा ध्यान केन्द्रित रखा है। डॉ. अंजली जी का यह कार्य स्तुत्य है और यदि वे भविष्य में अन्य जापानी हाइकुकारों की सुप्रसिद्ध कृतियों का हिन्दी अनुवाद कर सकें तो जापानी संस्कृति व साहित्य के साथ भारतीय संस्कृति व साहित्य के मध्य आपसी साहित्यिक आदान-प्रदान तथा एक-दूसरे के साहित्यिक धरातल को समझने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कार्य हो सकेगा। इस पुस्तक का भरपूर स्वागत होगा और मासाओका शीकी को केवल नाम से ही नहीं उनकी हाइकु कविताओं के साथ उन्हें याद रख सकेंगे।
जापानी हाइकु और हिन्दी हाइकु के मध्य भाषा का जो बड़ा पहाड़ खड़ा हुआ है उसके मध्य डॉ. अंजली जी की यह पुस्तक खिड़की खोलने का कार्य करती है, भविष्य में यह उम्मीद की जा सकती है कि यह खिड़की बड़े दरवाजे का आकार ले सकेगी और शीकी द्वारा अपने सदा जीवित रहने (कवि कभी नहीं मरता जब तक उसके द्वारा रचित साहित्य को पढ़ने वाले पाठक हैं) की गर्वोक्ति हिन्दी हाइकुकारों के मध्य भी संचरित हो सकेगी-

"If Someone asks
Say I’m still alive
autumn wind."

"यदि कोई पूछे
कहो मैं अभी जीवित हूँ
पतझड़ की हवा।"

पुस्तक का आवरण सुन्दर व आकर्षक है। 158 पृष्ठ की इस पुस्तक का मुद्रण त्रुटिहीन है एवं अन्तर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप है। पुस्तक प्रकाशन के अवसर पर डॉ. अंजली देवधर जी को मैं हार्दिक बधाई देता हूँ।

Sunday, January 13, 2008

विश्वभर से बच्चों के हाइकु


"विश्वभर से बच्चों के हाइकु"

विश्वभर के बच्चों के द्वारा लिखी गई अनेक भाषाओ की हाइकु कविताओं के हिन्दी अनुवाद सहित पहली बार प्रकाशित पुस्तक-




विश्व भर से बच्चों के हाइकु
हाइकु प्रवेशिका (डा० अंजली देवधर)








० "हाइकु" दुनिया की सबसे छोटी कविता है जो मात्र १७ अक्षरों में लिखी जाती है। इसमें तीन पंक्तियाँ होती हैं पहली पंक्ति में ५ अक्षर दूसरी में ७ अक्षर तथा तीसरी पंक्ति में ५ अक्षर होते हैं।
० हाइकु मूलत जापानी काव्य विधा है। अंग्रेजी में १७ अक्षर के नियम का पालन नहीं किया जाता है परन्तु हिन्दी में यह संभव है।
०हाइकु में प्रकृति के किसी विशेष क्षण को अनुभूति को अभिव्यक्त किया जाता है। इस तरह हाइकु कविता व्यक्ति को प्रकृति, समाज, परिवेश एवं प्राणिमात्र के साथ सामंजस्य बनाना सिखाती है।
० बच्चों में चूँकि प्रकृति के प्रति लगाव स्वाभाविक रूप से होता है इसलिए बच्चों को हाइकु लिखना यदि सिखा दिया जाए तो उनके मानसिक विकास एवं व्यापक दृष्टिकोण विकसित करने की दिशा में ये बहुत उपयोगी है।
० इस पुस्तक में दुनिया भर से ३० देशों के बच्चों के द्वारा लिखे गए हाइकु हैं, जिन्हें अंग्रेजी तथा हिन्दी में प्रकाशित किया गया है।
० बच्चों के अन्दर छिपी अदूभुत रचनात्मक प्रतिभा को विकसित करने की दिशा में यह पुस्तक अति महत्वपूर्ण है, इस पुस्तक में प्रकाशित हाइकु कविताओं की चर्चा पूरे विश्व समुदाय में हो रही है। बच्चों के लिए पूरी दुनिया के बाल मनोवैज्ञानिक व शिक्षाविद् इसे बहुत उपयोगी बता रहे हैं।
० पुस्तक में कुल ३०६ हाइकु हैं जो विश्व स्तर पर बच्चों कि लिए हाइकु प्रतियोगिताओं में चुने गए हैं, इन्हें ३० देशों के बच्चों ने लिखा है।
० पुस्तक का प्रकाशन विश्व स्तर की पुस्तकों के अनुरूप है। इस पुस्तक में २४२ पृष्ठ हैं तथा इसका मूल्य रु० 300 है।
० इस पुस्तक को यदि विद्यालयों के पुस्तकालयों में रखने की व्यवस्था हो जहाँ इसे शिक्षक तथा बच्चे पढ़ सकें तो यह पुस्तक बच्चों के सर्वांगीण विकास की दिशा में क्रांति ला सकती है।

विश्वभर से बच्चों के हाइकु -हाइकु प्रवेशिका
डा० अंजलि देवधर
JAL Foundation
JAL Bldg; 2-4-11, Higashi-Shinagawa
Shinagawa-Ku and Tokyo 140-0002, JAPAN