Monday, April 15, 2013

ध्वनि



ध्वनि
हाइकु संग्रह
रचनाकार- रामस्वरूप मूँदड़ा

हिन्दी तथा आधुनिक जापानी हाइकु का तुलनात्मक अध्ययन



हिन्दी तथा आधुनिक जापानी हाइकु का तुलनात्मक अध्ययन
आलोचना पुस्तक
डा० करुणेश प्रकाश भट्ट


कहता कुछ मौन



कहता कुछ मौन
हाइकु संग्रह
रचनाकार- हरिराम पथिक


Sunday, December 30, 2012

शंख सीपी रेत पानी


अपने समय का सच कहने की हिम्मत सँजोये गज़ल संग्रह-  शंख सीपी रेत पानी
-डा० वेदप्रकाश अमिताभ

यह आकस्मिक नहीं कि समकालीन रचनाकार खुद को ‘कबीर’ से जोड़ने में गर्व का अनुभव करते हैं। कबीर में उन्हें एक ओर दलित उत्पीड़ित जनसमुदाय के जीवन–संघर्ष की पक्षधरता मिलती है‚ दूसरी ओर उनका ‘सच बोलने का साहस’ भी प्रेरित–प्रोत्साहित करता है। कमलेश भट्ट ‘कमल’ के गज़ल–संग्रह ‘शंख सीपी रेत पानी’ को पढ़ते समय सच बोलने की सजा है‚ जानते हैं’‚ ‘झूठी दुनिया में सच के संग ऐसी भी है मनमानी’‚ ‘सच के पथ पर मुश्किलें ही मुश्किलें हैं हर कदम’‚ ‘किस कदर मुश्किल है सच का बोलना‚ वो क्या जाने। बोलना सच का कभी खुद आपका ही सर माँगे’‚ ‘बहुत मुश्किल है कहना क्या सही है क्या गलत यारों’‚ ‘फिर रहनुमा कहाँ से सच की जुबान लाते’‚ ‘सच कहूँ तो आफतें ही आफतें’‚ ‘सच बोले तो जग बैरी हो।’ आदि दर्जनों उद्धरणों में श्री कमल के असमंजस‚ दुख और आक्रोश के स्वरों को पढ़ा जा सकता है। जब समूची व्यवस्था झूठ के रंग में रंगी है तब रचनाकर सच बोलने का साहस करता है‚ विसंगतियों–विडम्बनाओं को रेखांकित करता है‚ क्योंकि तमाम आतंक–भय के बावजूद वह आश्वस्त है कि ‘सच’ को झूठ के पर्दे में छिपाया नहीं जा सकता—

 झूठ ने सौ बार अपनी शख्सियत बदली
 सच मगर सच ही रहा हर बार लोगों में।

 झूठ अपना रंग बदलेगा किसी दिन 
 सच मगर फिर भी खरा–सच्चा रहेगा।

 यकीनन झूठ की बस्ती यहाँ आबाद है लेकिन
 बहुत से लोग जिन्दा हैं अभी सच बोलने वाले।
चूँकि रचनाकर सच बोलने वाली दुर्लभ प्रजातियों में से एक है‚ अतः उसके समय और समाज के हादसों का बयान इन गज़लों में स्वाभाविक है। व्यवस्था की कुरूपता‚ मजहबी पागलपन‚ नारी–उत्पीड़न से लेकर बेरोजगारी‚ पारिवारिक कलह तक श्री कमल के निशाने पर हैं। वे जहाँ इन सबके प्रति अपना प्रखर प्रतिवाद जताते हैं‚ वहीं मानवीय और सकारात्मक मूल्यों की पक्षधरता भी उन्हें अभीष्ट है। आज जो धार्मिक उन्माद ‘फासीवाद’ का खतरा बनकर मँडरा रहा है‚ उसे रचनाकर ने बहुत गंभीरता से लिया है। ‘मजहबों से जख्म पहले भी मिले, दिल मगर इतना कभी घायल न था’ –जैसी पंक्तियों में न केवल वास्तविकता की पहचान हुई है‚ अपितु इस त्रासदी को लेकर संवेदनशील मन की तकलीफ भी मर्मभेदी है। इस सदंर्भ में ‘कबीर’ का स्मरण रचनाकार को निराश होने से बचाता है—
1–कभी मज़हब नहीं होते कबीरों के
2–जो मज़हब के शिकंजे हैं कबीरों पर नहीं चलते।
‘साम्प्रदायिकता’ को लेकर श्री कमल आश्वस्त हैं कि मनुष्यता पर यह उन्मादी प्रवृत्ति हावी नहीं हो पायेगी। उनका इस तरह सकारात्मक विश्वास उनकी गज़लों को वैचारिक तौर पर सम्पन्न और प्रखर बना रहा है— ‘रोशनी अब भी नहीं बिल्कुल मरी है मानिए, बस हुआ ये है धुँधलके और गहरे हो गए’। मनुष्यत्व में गहरी आस्था और परिवर्तन में विश्वास की रोशनी किसी एक सम्प्रदाय या धर्म की निधि नहीं है—
मंदिरों में मस्जिदों में अन्ततः वह एक थी
हर तरफ हर रंग में जो रोशनी देखी गयी।
नारी जीवन की यातनाओं पर इस संग्रह में कई जगह मार्मिक कथन और संवेद्य बिम्ब हैं‚ जो अनुभूति और विचार की संश्लिष्टता से संपृक्त हैं। ‘क्यों डाली गयी वह‚ प्रश्न है हर बाप का यूँ कि देवी की तरह ही वह भी शौहर तक गयी’—इस शेर में नारी–दहन का हादसा है। नारी को बाजार बना देने की मोनोवृति को श्री कमल ने आक्रोश के साथ खारिज किया है—
मर्दों के हाथ औरत बाजार हो रही है
औरत का गम नहीं ये मर्दों की त्रासदी है।
कुछ बहुत साधारण क्षणों और अनुभवों पर‚ जो मध्यवर्गीय जीवन के चिरपरिचित दृश्य हैं‚ श्री कमल ने बहुत सहजभाव से लिखा है। यह उनके भाषाधिकार और अभिव्यंजना—शक्ति का परिचायक है। ‘गृहस्थी साथ जाती है‚ अगर दफ्तर में जाता हूँ जो घर को लौटता हूँ तो मुझे दफ्तर सताता है’ —जैसे शेर गौरतलब हैं अपने मंतव्य को सलीके से परोसने में रचनाकर सर्वत्र सफल है। चिड़ियों के ब्याज से जिजीविषा की व्यंजना करनेवाली सक्षम पंक्तियाँ इस प्रकार हैं—
टूट चुकी है इंसानों की हिम्मत कल की आँधी में
लेकिन फिर भी आज न तिनके लाना छूटा चिड़ियों का।
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